बेबाक बोल
बन्दूक
बनाम कलम
जहाँ मस्तिष्क भय से मुक्त
हो और सिर उन्नत हो,जहाँ ज्ञान स्वतंत्र हो,जहाँ विश्व का संकीर्ण गृह-प्राचीरों
ने विभाजन न किया हो,जहाँ तर्क का निर्मल प्रवाह रूढ़ आदतों की सूखी रेत में खो न
गया हो, हे पिता उस स्वर्ग में ही मेरे देश को जगा.
रविन्द्र नाथ टैगोर के ये
विचार हमारे देश के भविष्य के बारे में थे जो किसी समाज के उन्नत और प्रगतिशील
होने की गवाही देते हैं. परन्तु जो स्थिति आज हमारे सामने है वह निश्चय ही घोर
चिंताजनक है. कलम की शांतिप्रिय गूँज को बन्दूक के शोर से दबाने की कोशिश हो रही
है.ये हमें प्रगति की उल्टी धारा में बहा कर ले जायेगी. बहुलतावाद और विचारों की
भिन्नता ही मानव समाज की प्रगति का आधार है ,एक समान विचार और सोच समाज को जड़ बना
देंगे. हमारा तो इतिहास ही इस बात का गवाह रहा है की हमने सभी प्रकार के विचारों
को जगह दी है उन्हें अपनाया हो या नहीं परन्तु उन्हें अपने तर्क प्रस्तुत करने की
आज़ादी दी है.यहाँ वेद पुराणों के कर्मकांड हों या चार्वाक दर्शन सभी को पर्याप्त
स्थान दिया गया है.फिर आज समाज में असहनशीलता का बढ़ते जाना चिंता का विषय है. कुछ
निहित स्वार्थ इसके बीज डालते है राजनीति
इसे उपजाती है हवा पानी भी देती है फिर मौका मिलने पर फल भी झपट लेती है.
लोकतंत्र को विरोधी विचारों
के रक्षक के रूप में देखा जाता है परन्तु इस प्रकार विचारों का गला घोटना लोकतंत्र
के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा कर देगा.
पत्रकारिता का विद्यार्थी
होने के नाते आजकल अक्सर हमें ये सुनने को मिलता है कि हम सिर्फ नकारात्मक चीजों
को न देखें सकारात्मक चीजों पर खुशी भी व्यक्त करें जिससे हमारे लेखन के द्वारा
समाज में नकारात्मकता न पैदा हो ,परन्तु मेरे विचार से ऐसी परिस्थितियों में जब
कलम को बन्दूक का डर दिखाया जा रहा हो तो हमें तथाकथित सकारात्मक चीजें सिर्फ
बनावटी दिखाई देती हैं .
ये बात हमारे सिस्टम को
समझना होगा की सभी स्वर कभी एक जैसे नहीं हो सकते,सभी विरोधाभासी स्वरों को
पर्याप्त स्थान देना और विरोध की अभिव्यक्तियों की रक्षा करना हमारे नीति नियंताओं
का पहला कर्तव्य है,इनकी रक्षा किये बगैर हम स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर
सकते.
बन्दूक से सिर्फ रक्तरंजित
अस्थाई सत्ता का निर्माण या सीमा का विस्तार हो सकता है,कलम प्रगतिशील मानव समाज
की मसाल धारक है.
जितेन्द्र कुमार,भारतीय
जनसंचार संस्थान नई दिल्ली
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